शुक्रवार, दिसंबर 08, 2006

मध्यान्हचर्चा दिनांक: 8-12-2006

संजय ने कक्ष में कदम रखने से पहले ही सोच लिया था कि आज धृतराष्ट्र उनकी परेड करवाने वाले है. हुआ भी वही, इधर कक्ष में कदम रखा उधर धृतराष्ट्र ने आड़े हाथों ले लिया.
धृतराष्ट्र : कहें इसबार कौन-सी बिमारी लगी आपको, जो इतने दिनो बाद पधारे हैं?
संजय : महाराज आज-कल इस बिमारी का संक्रमण व्यापक रूप फैला हुआ है, फिर भला मैं कैसे बच पाता? मैं व्यस्त था महाराज.
धृतराष्ट्र : आपको फुर्सत हो तो देखें कहाँ-कौन-क्या लिख रहा है?
संजय : जी महाराज,
धृतराष्ट्र : कहाँ खो गए?
संजय : महाराज समझने की कोशिश कर रहा था. अरविन्दजी ने हिन्दी मीडिया के बारे में फिरंगी भाषा में कुछ लिखा है, तो एक फिरंगी (अमरीकी) ग्रेग ने हिन्दी में लिखा है. दोनो को ही समझना पड़ता है.
धृतराष्ट्र की कोफी का मग आज चपरासी अब लेकर आया. इसी का इंतजार था. उन्होने कोफी का घूँट भरा.
संजय : जगदीशजी को चाँदनी-चौक के मैक-डॉनाल्ड में देख, बिहारी बाबू ने सोचा की नेताओं के लिए एकदम ऐसी ही एक अलग जेल बनानी चाहिए और उधर प्रसिद्ध लोगो के लिए पैसे बरसाने वाली जेल रमणजी के बिग-बोस ने बना भी डाली. पैसे बनाने की ई-मेलिया तरकीब बता रहे हैं नितिन जी.
धृतराष्ट्र : पर संजय, लोग तो इन सेलिब्रिटीयों का तमाशा देख रहे हैं.
संजय : इस शो का उद्देश्य भी तो वही है, महाराज. पर इन बरसी मनाते लोगो का उद्देश्य तो खुदा भी नहीं समझ पा रहा है और न ही ख़ुदाई की खुदाई को रत्नाजी समझ पा रही है. मगर कोई पेटेंट के बारे में समझना चाहता हो तो उन्मुक्तजी लाएं हैं पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता की प्रस्तावना. लाभ उठाएं. लाभ यहाँ भी उठाया जा सकता है, हिन्दी कम्प्युटिंग कि दिशा व दशा को बयान कर रहे हैं रविजी.
धृतराष्ट्र : और यह खिलखिला कौन रहा है?
संजय : महाराज, ये गिरिराजजी हैं जो सागर भाई को हँसाने की कोशिश कर रहे हैं. और आज गिरिराजजी का जन्मदिन भी हैं. तरकश पर इनका परिचय के साथ बधाई संदेश भी रखा गया है.
और महाराज तरकश पर ही साठ साल से जवान बिकीनी के बारे में जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है. अंत में यहाँ कार्टून देखना न भूलें.
आप देखिये मैं होता हूँ लोग-आउट.

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