शुक्रवार, दिसंबर 01, 2006

गांधी जी के बहाने कुछ बातचीत

आज की चिट्ठाचर्चा का काम अतुल का था। पता नहीं क्यों वे यह नहीं कर पाये! बहरहाल अभी जब मैं शाम को आज के चिट्ठे देख रहा हूं तो यह सोचा कि कुछ चर्चा-सर्चा कर ली जाये। मध्यान्ह चर्चा करने वाले काफ़ी का कप लिये संजय भी नहीं दिखे तो यह और जरूरी लग रहा है।

कल जब मैंने चिट्ठों के बारे में लिखा तो उस समय तक जितने चिट्ठे दिखे उतने की चर्चा कर ली। फिर भी कुछ चिट्ठे छूट गये। उनमें से एक सृजन शिल्पी का चिट्ठा भी जिसमें गांधी की महानता पर पुनर्विचार किया गया। बाबा रामदेव के वक्तव्य को उद्धरत करते हुये शिल्पीजी ने लिखा:-

उनका (बाबा रामदेव का)कहना है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए अकेले गाँधी को श्रेय नहीं दिया जा सकता। वह अहिंसा के सिद्धांत को जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय भी गाँधी को नहीं देना चाहते। वह कहते हैं कि साबरमती के संत, तूने कर दिया कमाल वाला गीत किसी चापलूस का लिखा हुआ है जिनसे गाँधीजी हमेशा घिरे रहते थे।


इसके बाद ऒशो और तमाम अन्य विद्वानों के विचार बताते हुये शिल्पीजी ने अपनी बात लिखी:-

मैं कुछ विद्वानों के इस मत से सहमत हूँ कि गाँधीजी यदि लॉर्ड इरविन के साथ समझौते के समय अड़ गए होते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी नहीं हुई होती और यदि गाँधी एवं नेहरू के मन में सुभाष चन्द्र बोस के प्रति दुराग्रह नहीं होता तो आजाद भारत को अपने उस अनमोल रत्न की सेवाओं से वंचित नहीं होना पड़ता। शायद गाँधीजी के मन में कहीं न कहीं यह महत्वाकांक्षा थी कि लोकप्रियता के मामले में कोई उनसे आगे नहीं निकल जाए, खासकर कोई ऐसा व्यक्ति जो उनके विचारों का विरोधी हो। उन्हें भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आई थी। लेकिन गाँधीजी के मन में इस तरह की भावना जगाने वाले जवाहरलाल नेहरू थे, जो अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाना चाह रहे थे।


तमाम साथियों ने इस पर अपनी टिप्पणियां लिखी हैं लेकिन आज जब मैं पहली बार इसे पढ़ रहा हूं तो मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि अपने क्या विचार व्यक्त करूं। शिल्पीजी के इन विचारों से यह लगता है कि गांधी नेहरू राष्ट्रनायक न होकर एकता कपूर के सीरियल कोई कलाकार थे जो तमाम दूसरे लोगों को अपने रास्ते से हटाने की जुगत में ही लगे रहे। गांधी-इरविंग समझौते में गांधी के न अड़ने की बात कहकर वे पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं? उस समय की परिस्थितियां क्या थीं यह हम केवल इतिहास के अध्ययन से जान सकते हैं। अगर गांधीजी भगतसिंह, आजाद, सुखदेव को बचाने के लिये अड़ते तो अपनी अहिंसा की वकालत किस मुंह से करते? भगतसिंह जब शहीद हुये तो शायद २३ वर्ष के थे और उस समय गांधीजी करीब पचास साल के लगभग रहे होंगे। अपने से आधी उमर के राष्ट्रनायकों को अपने रास्ते से हटाने के कुचक्रों में लगे थे गांधी-नेहरू ,यह लिखना व सोचना निहायत बचकाना पन है। कम से कम मैं ऐसा सोचता हूं। बाकी का मैं नहीं जानता। बाकी जो भी दुनिया में आया है उसमें कुछ न कुछ कमियां होंगी जो समय-स्थान सापेक्ष होंगी। प्रियंकर जी की टिप्पणी कि गांधी कोई बतासा नहीं हैं पढ़कर बहुत दिन बाद यह वाक्य पढ़ने का मजा आया!

इसी कड़ी में सागर चन्द नाहर जी के भी विचार पठनीय हैं जो यह मानते हैं:-
यह एक कटु सत्य है कि गांधीजी को भी अपनी लोकप्रियता कम होने का खतरा था इस वजह से हमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को खोना पड़ा। जितना नुकसान देश का गाँधीजी के सिद्धान्तों और नेहरूजी की वजह से हुआ उतना किसी और वजह से नहीं हुआ। जो लोग वाकई जानना चाहते हैं कि देश को क्या नुकसान हुआ गाँधीजी के सिद्धान्तों की वजह से वे जरा एक बार यहाँ क्लिक करें। ना
गाँधीजी ने नेहरूजी को प्रधानमंत्री बनाया होता, ना कश्मीर की समस्या पैदा हुई होती, जिसमें अब तक लगभग 70000 निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं।


ऐसे ओजस्वी बयान के आगे प्रेमेंन्द्र प्रताप सिंह लिखते हैं:-
भारत को अब गांधियों के चंगुल से मुक्‍त करना होगा। यह‍ विरोध आगे जारी रहेगा आप भी इस विरोध मे सामिल होइये, अपनी अभिव्‍यक्ति को सामने लाइये। आखिर आप कब तक चुप रहेगें, अब बोलने का समय है।


इसी कड़ी में मुकेश बंसल अपने सारगर्भित लेख में कहते हैं:-

ठीक इसी प्रकार गान्धी जी जब इन शहीदों के बारे में बोलते हैं तो उनकी बातों से इन वीरों के प्रति आदर ही झलकता है, और विरोध करते हैं तो मात्र ‘हिंसा’ की मानसिकता का। 29 मार्च 1931 को ‘भगत सिंह’ शीर्षक से नवजीवन में प्रकाशित एक लेख में गान्धी जी जहां एक ओर गान्धी जी भगत सिंह से मतभेद प्रगट करते हैं,वहीं दूसरी ओर लिखते हैं कि “इन वीरों ने मौत के भय को जीता था। इनकी वीरता के लिए इन्हें हजारों नमन हों।” इसी लेख में गान्धी जी लिखते हैं कि भगत सिंह हिंसा को अपना धर्म नहीं मानता था; वह अन्य कोई उपाय न देख कर ही खून करने को तैयार हुआ था।


आगे वे आवाहन करते हुये लिखते हैं:-

आइये, हम प्रण करें कि कभी दो व्यक्तियों की तुलना नहीं करेंगे। कभी किसी व्यक्ति की निन्दा भी नहीं करेंगे। महापुरूषों के गुण उन्हें सदैव आदरणीय बनाते हैं, चाहे उनकी कार्य प्रणाली से हम सहमत न हो पाएं। इसलिए हर मतभेद के बावजूद उनके गुणों का आदर हम करते रहेंगे।

गांधीजी पर जब बात हो तो गांधीगिरी की बात होना लाजिमी है। इंदौर में हुई गांधीगिरी का किस्सा देखिये मालव संदेश में। गांधीजी पर जब बाते चलेगी तो आमआदमी का जिक्र आये बिना नहीं रह सकता। जगदीश भाटिया जी आम आदमी और उसकी बदलती परिभाषा के बारे में बता रहे हैं अपने लेख में।

समीर और श्रीष जी की के कहने पर रचनाजी अपने बारे में बताते हुये कहती हैं :-
बहुत खोजा मैंने लेकिन अपने बारे मे लिखने को ‘मनभावन’ कुछ मिला ही नही!

मेरा नाम आप सब जानते ही हैं और हम दुनिया में कहीं भी रह्ते हों ‘यहाँ’ या ‘वहाँ’ या फिर ‘झुमरी तलैया’ में (बशर्ते वहाँ अन्तरजाल की सुविधा हो!), इससे क्या फर्क पडता है! हम हमारे चिट्ठों पर ही मिलते रहते हैं और उस लिहाज से सब एक दूसरे से सिर्फ दो ‘क्लिक’(अगर ‘फेवरिट’ मे ‘एड’ हों तो!!) या फिर तीन या चार ‘क्लिक’ दूर हैं.


मनभावन शुरुआत के बाद वे चिट्ठों के बारे में लिखने लगीं:-
मै चिट्ठों को हर गाँव, कस्बे या शहर में गली के किसी नुक्कड़ पर हर दिन होने वाली चर्चाओं का ही परिष्कृत रूप मानती हूँ जहाँ खेल, राजनीति या सामाजिक विषयों पर चर्चाएँ होती हैं.फर्क सिर्फ यह है कि चिट्ठा जगत के लोग कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे और विचारक किस्म के होते हैं (मै उनमें से एक नही हूँ!!).यहाँ हम शब्दों और विचारों से एक दूसरे को जानते है और पसंद या नापसंद करते हैं. कई बार हमारे शब्दों से हम वो बताते हैं जैसे कि हम हैं, लेकिन कई बार हमारे शब्दों से हम वो कहते हैं जैसा कि हम होना चाहते हैं.


अपनी पोस्ट खतम करते-करते वे मजाक के मूड में आ गयीं:-
१. मै किसी भी मजाक का बुरा मान सकती हूँ!!
२. मैं किसी भी बात को मजाक मान सकती हूँ!!!

रचना जी के मजाक को सच मानकर समीरजी डर गये और डरते-डरते टिप्पणी कर बैठे।

सृजनगाथा में प्रकाशित अपने आलेख वेश्या में गिरिराज जोशी लिखते हैं:-
समाज के इसी दोगलेपन को मैंने बहुत करीब से महसूस किया जनवरी २००६ में ...। उस समय मैं गुलाबी नगरी जयपुर में प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी मे जुटा था। मेरे एक मित्र ने मेरा परिचय अपनी सहपाठी कुमारी प्रियंका से करवाया। प्रियंका जितनी सुन्दर थी उतनी ही उलझी हुई । मैं ज्यों-ज्यों उसके बारे मे जानने लगा मेरी उत्सुकता बढती गई। उसका जन्म श्रीगंगानगर के समीप स्थित एक गाँव के साधारण किसान परिवार मे हुआ। पिताजी सिख धर्म से और माँ हिन्दु धर्म से होने के कारण वो दोनो ही
धर्मों व संस्कारों से भली-भांति परिचित थी।


इतना पढ़ने के बाद आपका हक बनता है कि आप कुछ सच्चे मोती पायें और कमर जलालवी की गजल पढ़ें:-

वादा था उनके रात के आने का ऐ 'क़मर'
अब चाँद छुप गया उन्हें आ जाना चाहिए


लगे हाथ आप वह पत्थर भी देख लें जिसका अपनी किसी पोस्ट में लाल्टूजी जिक्र किया होगा। उधर दुबई से बेजी मां के रूप दिखा रही हैं अपनी कविता में:-
भूख से बिलखिलाते बच्चे का रूदन..
दूध से भीगी थी नई चोली ,नई दुल्हन…
-----------------------------

लोहा चुनते हुए उसने भी सुना यह रूदन...
आज लोहे के साथ मिला सोने का कंगन…


शुऐब पहली बार डिस्को गये तो तमाम सीन देखे। आप उनके साथ देखिये लेकिन आखिरी सीन सबसे ज्यादा जानदार है जहां उनके विचार हैं:-
पहली बार डिस्को आकर मुझे जो शर्म और डर मेहसूस हआ मगर अब सोच रहा हूं कि यहां हर टाईप के लोग आए हैं जो अपने धर्म ज़ात और ईमान को साईड मे रख कर थोडी देर के लिए सब एक साथ खुशी मे नाच रहे हैं मगर यही लोग डिस्को से बाहर निकलने के बाद शरीफ इनसान होने का नटक क्यों करते हैं। मसजिद मे हिन्दू नही आसकते और मंदिर मे मुस्लमानों का दाखिला नही मगर ये डिस्को हर एक को खुश आमदीद करता है यहां अंदर किसी के साथ भेद भाव नही यहां सब एक हैं। दुनिया वालों के सामने सबसे अच्छा इनसान होने का नाटक और यहां डिस्को के अंदर जानवर होने का नाटक, कितनी अजीब ज़हनियत है हम इनसानों मे, पता नही हम अपने आप को धोका देते हैं या दुनिया वालों को????


इसी बात पर विजय वडनेरे लोगों को सावधान करते है:-

जहाँ तक षडयंत्र की बात है - वो ऐसा है कि - बड़ी मछली छोटी मछलियों को ऐसे ही तो खा जाती है - जब मार्केट में बड़े बड़े लोग ही सारे क्राईम करेंगे तो हम जैसे छोटे-मोटे उठाईगिरों का पता नहीं क्या होगा? आज एल मामूली सी टिप्पणी के जरिये नाम चुरा लिया गया है, कल हो सकता है मेरी पोस्ट ही तड जाये!! आप लोग भी होशियार रहियेगा।


और सुनील दीपक जी कहते हैं कि आलोचना का अधिकार सबको है। इसीबात पर शिशुपाल वध हो गया और तुषार जोशी पेश कर रहे हैं एक अनुवादित कविता
:-
कैसे काट पाओगे जी
दिन आप मेरे बिना
दिन सारे काटने को आयेंगे

गुलाब सी अखियों के
पलकों की पंखडी में
ढेर सारा पानी भर लायेंगे


शीघ्र ही आप तुषार जोशी जी से मराठी चिट्ठों की चर्चा सुनेंगे। फिलहाल हमारी आज की कथा यही तक। आगे की चर्चा के लिये कल मिलेंगे देबाशीष। उसके भी पहले हमारे कोई भी साथी चर्चा कर सकते हैं जैसे हमने आज कर ली! आप देखते रहिये चिट्ठाचर्चा!इसमें नहीं है कोई खर्चा!

आज की टिप्पणी/प्रतिटिप्पणी:-


१.टिप्पणी:-सिर्फ दो बातों का ध्यान रखें-

१. मै किसी भी मजाक का बुरा मान सकती हूँ!!
२. मैं किसी भी बात को मजाक मान सकती हूँ!!!

यही दो लाईनें पढ़कर इतना डर लग गया कि कांपते हाथों से टाइप कर रहा हूँ!!

समीरलाल

प्रति टिप्पणी:-अरे समीरजी, रचनाजी ने मजाक किया और आप डरने की आदत बरकरार रखे हो!

आज की फोटो:-



आज की फोटो सुनील दीपक के फोटोब्लाग से

नाव की सवारी
नाव की सवारी

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3 टिप्‍पणियां:

  1. 'श्रीष' नहीं भईया, 'श्रीश' लिखिए, शायद आपने मेरी मेरा नाम श्रीश है नामक पोस्ट नहीं पढ़ी।

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  2. वाह भई, गांधी जी के बहाने भरपाई में काफी बेहतरीन चर्चा कर गये. गांधी जी पर आपके विचार से मैं सहमत और प्रभावित हूँ.
    --सुंदर चर्चा ओर वो भी अकस्मात, बधाई की बनती है!! :)

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  3. संजय का गेरहाज़िर रहना हमें भी अखर रहा था, पर क्या करते? दो दिनो से समय ही नहीं निकाल पाए.
    आपने मध्यान्ह तथा चिट्ठा दोनो चर्चाओं की भरपाई बखुबी कर दी. साधूवाद.

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