बुधवार, दिसंबर 27, 2006

हम होंगे कामयाब




अब लो कर लो बात, हमारे ई-पंडित जी अपने होनहार छात्रों से आपका परिचय करवाने लाये हैं, पूरी उत्तर पुस्तिका के साथ. बालक बड़े ही होनहार हैं और इन हाथों में देश का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है. आप भी देखें:


प्रश्न: रंगीन काँच किस प्रकार बनाया जाता है ?
उतर: रंगीन काँच बनाने के लिए काँच को पिघलाकर उसमें अनेक प्रकार के रंग मिलाकर रंगीन काँच बनाया जाता है।
(इटस सो सिम्पल यार)


बाकि की उत्तर पुस्तिका तो पंडित जी पाठशाला में ही देखें. जबाब पसंद आयेंगे, न आये तो पाठशाला की फीस माफ और साथ में फ्री जुगाड़ी लिंक की व्यवस्था आपके लिये अलग से की जायेगी.

अरे भई, आप तो सिरियस हो गये कि फीस माफ कराओ अब!! अरे, ऐसा क्या बिगड़ गया जो इतना हल्ला मचाते हो, क्या लाये थे जो लुटा आये इतनी सी १० लाइन पढ़ने में. पूरी गीता तुम्हें यही समझाने के लिये लिखी गई और तुम हो कि समझते नहीं. यह देखो, फिर से गीता सार, सिर्फ तुम्हारी इन्हीं हरकतों की वजह से उड़न तश्तरी ने इतनी वजनी किताब का सार निकाला गया है ताकि थोड़ा पढ़ो ज्यादा जानो की तर्ज पर कुछ तो समझ ही जाओगे:

कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ.
आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है.
कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.

व्यस्तता का दौर चल रहा है...


बाकी वहीं जाकर पढ़ो, फायदा करेगा यह ज्ञान, इसी चिट्ठाजगत के लिये है. जब पढ़कर आप ज्ञानी हो जायें तब राजीव जी की प्रेम के प्रति आस्था देखने पहूँचें. तभी ठीक से समझ आयेगी. ज्यादा गहराई में उतरना हो तो पढ़ो सृजन शिल्पी की पेशकश शमशेर की कवितायें और फिर टटोलें, रंजु जी का बंजारा दिल वो भी तन्हा तन्हा. वैसे नया कम्बो स्पेशल है बंजारा दिल और तन्हा तन्हा.

खैर, गहराईयों की कमी नहीं है, चाहिये मात्र एक बेहतरीन गोताखोर. तो देखिये हमारे डिप गोता एक्सपर्ट डॉ प्रभात टंडन, दवाखाना छोड़ ओशो के प्रवचनों में डूबे बैठे हैं और ज्ञान गंगा का पूरा पानी, डैम फोड कर बहा रहे हैं. संभल कर जाना, करंट बहुत तेज है, कहीं बह ही न जाओ. जाने के लिये अगर रेलगाडी से जाना हो, तो रास्ते के लिये कुछ चुटकुले लेते जाओ, जीतू भाई से.

रवि रतलामी के देसीटून्ज़ का मजा लो और जब मजा आ जाये, तो हँसी मजाक छोड़ थोड़ा ज्ञान भी वहीं से उठा लो ब्याज में-मॅड्रिवा लिनक्स पर हिन्दी.

सुनामी की विभीषिका की याद अभी भी एकदम ताजी है हर दिल दिमाग पर, तो सुने रचना जी दो वर्ष पूर्व इससे व्यथित हो क्या लिखा था.

उन्मुक्त जी के बच्चन-पंत विवाद और तपस की रणभूमि से दूर राकेश खंडेलवाल जी अपना ही एक अलग गीत गुनगुनाने में व्यस्त हैं-बस एक नाम, वह नाम एक


वह चेतन और अचेतन में
वह गहन शून्य में टँगा हुआ
विस्तारित क्षितिजों से आगे
है रँगविहीन, पर रँगा हुआ
जीवन पथ का वह केन्द्र बिन्दु
जिसके पगतल में सप्त सिन्धुव
ह प्राण प्रणेता, प्राण साध्य
वह इक निश्चय, अनुमान एक

बस एक नाम वह नाम एक



और शैशव पर देखें बापू की प्रयोगशाला का भाग ८ और दिल्ली से मनीषा जी कह रही है कि अगले साल भी रहेगी निवेशकों की मुस्कान. हम तो सभी यही चाहते हैं कि अगले साल ही क्यूँ-यह सिलसिला तो हर साल कायम रहे.

अब चलते चलते रत्ना जी को भी ढ़ेरों शुभकामनायें उनके इस दृढ़ प्रतिज्ञा के लिये कि हम होंगे कामयाब.

अब चलने की तैयारी. सभी को नमन.

आज की टिप्पणी:

संजय बेंगाणी -डॉ प्रभात टंडन के चिट्ठे पर:

साधूवाद. उम्दा लिखा है.
परिवार नियोजन का विरोध खुदा की मर्जी का वास्ता देकर करने वाले, बिमार पड़ने पर या दूर्घटना होने पर दवाईयाँ न ले कर दिखाए. आखिर खुदा की मर्जी जो तुम्हे बिमार किया, बचाना होगा तो बच जाओगे. दवाई लेकर खुदा के काम में टाँग काहे डाल रहे हो?

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बढि़या है. सबेरे सबेरे देख लिये ऒशो को!

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  2. ज्ञान की गंगा के साथ चर्चा करते है प्रभु
    आपको शत शत नमन है
    उपरोक्त वाक्य से आपको आपके शिष्य की याद आ गई हो.. गला सुखने लगें, आँखे भर आए तो ... आप जानते ही हैं क्या करना होता है।

    अरे आँखे पोंछ लो भाई, जयहिन्द।

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  3. अरे सर जी ,आप तो उडन तशतरी मे बैठ के बाहर चले गये, काहे को मेरी क्लीनिक बन्द करवा रहे हो, यह सब जाडों का मजा है यानी healthy season का । फ़रवरी के बाद ओशो भाई को किनारे करना पडेगा ।

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